सोमवार व्रत की पावन कथा: साहूकार और शिव कृपा
शिव कृपा से अल्पायु पुत्र का जीवन दान
1प्रथम प्रसंग: निपुत्रिक साहूकार की अनन्य भक्ति
एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी परंतु कोई संतान न होने के कारण वह दुखी रहता था। वह प्रतिदिन शिवालय जाकर निष्ठा से दीपक जलाता और भगवान शिव की आराधना करता। माता पार्वती के आग्रह पर शिव जी ने उसे पुत्र का वरदान दिया, किंतु यह भी कहा कि इस बालक की आयु मात्र 12 वर्ष होगी।
2द्वितीय प्रसंग: काशी यात्रा और राजकुमारी से विवाह
साहूकार का पुत्र जब 11 वर्ष का हुआ, तो उसे विद्याध्ययन हेतु मामा के साथ काशी भेजा गया। मार्ग में एक नगर में राजा की कन्या के विवाह के अवसर पर दूल्हा काना था, इसलिए छलपूर्वक साहूकार के सुंदर पुत्र से राजकुमारी का विवाह करा दिया गया। पुत्र ने राजकुमारी की चुनरी पर सत्य लिख दिया कि 'तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, पर मैं काशी विद्याध्ययन जा रहा हूं।'
3तृतीय प्रसंग: शिव-पार्वती कृपा से पुनर्जीवन
काशी में 12 वर्ष पूर्ण होने पर बालक के प्राण पखेरू उड़ गए। मामा विलाप करने लगे। उसी समय शिव-पार्वती वहां से गुजरे। माता पार्वती के अनुरोध पर महादेव ने उस धर्मात्मा बालक को नया जीवन प्रदान कर दिया। वह अपनी वधु के साथ सकुशल घर लौटा।
सोमवार का व्रत करने और कथा सुनने से संतान सुख, दीर्घायु और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
