करवा चौथ की पावन वीरावती एवं करवा माता कथा
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी की अमर कथा
1प्रथम प्रसंग: राजकुमारी वीरावती का कठिन निर्जला व्रत
प्राचीन काल में एक धर्मात्मा ब्राह्मण के सात पुत्र और एक गुणवती पुत्री थी जिसका नाम वीरावती था। वीरावती का विवाह एक योग्य राजकुमार से हुआ। करवा चौथ पर वीरावती अपने मायके आई और भाभियों के साथ निर्जला उपवास रखा। भूख और प्यास के कारण संध्या समय तक वीरावती की दशा दुर्बल हो गई और वह मूर्छित होने लगी।
2द्वितीय प्रसंग: भाइयों का प्रेम और मायावी चंद्र दर्शन
अपनी लाडली बहन का कष्ट भाइयों से देखा न गया। उन्होंने नगर के बाहर एक ऊंचे वटवृक्ष पर जाकर अग्नि जलाई और छलनी के पीछे से प्रकाश दिखाकर वीरावती से कहा—'बहन! चंद्रोदय हो गया है, आकर अर्घ्य दे दो।' सरल हृदय वीरावती ने उसे ही सच्चा चंद्रमा मानकर अर्घ्य दिया और जैसे ही अन्न का पहला कौर मुंह में डाला, समाचार आया कि उसके पति राजा की अचानक मृत्यु हो गई है।
3तृतीय प्रसंग: माता इंद्राणी/पार्वती का आगमन और पति का पुनर्जीवन
वीरावती विलाप करने लगी। उसके सच्चे सतीत्व को देखकर देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी (माता पार्वती) प्रकट हुईं। माता ने वीरावती को उसकी भूल बताई कि उसने अकाल चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत तोड़ा है। वीरावती ने क्षमा याचना की और पूरे वर्ष प्रत्येक माह की चतुर्थी का निष्ठा से व्रत रखने का संकल्प लिया। अगली करवा चौथ पर वीरावती ने संपूर्ण विधि से निर्जला व्रत रखा। उसकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने उसके पति को पुनः नवजीवन प्रदान किया।
4चतुर्थ प्रसंग: पतिव्रता करवा की मगरमच्छ से रक्षा कथा
एक अन्य प्रसंग के अनुसार करवा नाम की पतिव्रता स्त्री जब नदी में स्नान कर रही थी, तब एक मगरमच्छ ने उसके पति का पैर पकड़ लिया। करवा ने अपने सतीत्व के बल पर कच्चे सूत के धागे से मगरमच्छ को बांध दिया और यमराज के पास जा पहुंची। यमराज ने करवा के तपोबल से विवश होकर मगरमच्छ को यमलोक दंड दिया और उसके पति को चिरायु का वरदान दिया।
जो भी सुहागिन इस कथा को सुनती है, करवा माता और भगवान शिव-पार्वती की कृपा से उसका सुहाग सदा अटल रहता है।
