शनिवार व्रत कथा: राजा विक्रमादित्य और शनिदेव का न्याय
अहंकार का विनाश और शनि देव की कृपा
1कथा प्रसंग: ग्रहों में श्रेष्ठता का विवाद
एक बार नवग्रहों में श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। राजा विक्रमादित्य ने सभी ग्रहों के बैठने हेतु सिंहासन बनवाए, जिसमें शनि देव को सबसे अंत में लोहे का सिंहासन मिला। शनि देव ने कुपित होकर कहा कि मेरा फल सबसे भीषण होता है। विक्रमादित्य पर साढ़ेसाती आई और उन्हें अपना राज्य गंवाकर तेल के कोल्हू में बैल की तरह जुतना पड़ा। अंत में जब विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर शनि देव की स्तुति की, तब शनि देव प्रसन्न हुए और उनका खोया हुआ राज्य व वैभव वापस लौटा दिया।
शनि की पीड़ा से मुक्ति, कोर्ट-कचहरी में विजय और जीवन में स्थायित्व।