महाशिवरात्रि की पावन कथा: शिव-गौरी मिलन व शिकारी का उद्धार
शिव महापुराण से संकलित परम पावन आख्यान
1प्रथम प्रसंग: शिव एवं शक्ति का परम वैवाहिक मिलन
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की पावन रात्रि को देवाधिदेव महादेव और जगतजननी माता पार्वती का शुभ विवाह संपन्न हुआ था। इस दिन शिवजी वैरागी स्वरूप से गृहस्थ धर्म में प्रविष्ट हुए। इसलिए यह रात्रि शिव-शक्ति के परम मिलन का महापर्व मानी जाती है।
2द्वितीय प्रसंग: शिकारी गुरुद्रुह और बेलपत्र का अनजान समर्पण
शिवपुराण के अनुसार एक निर्दयी व्याध (शिकारी) वन में शिकार की खोज में भटक रहा था। सायंकाल तक कोई शिकार न मिलने पर वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर एक जलाशय के किनारे बेल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। पेड़ के नीचे एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित था, जिससे शिकारी अनभिज्ञ था। रातभर जागते हुए वह अनजाने में बेलपत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा, जो सीधे शिवलिंग पर गिरते रहे। साथ ही उसकी आंखों से गिरे आंसू शिवलिंग पर गिरकर अभिषेक बन गए।
3तृतीय प्रसंग: मृग परिवार का सत्यनिष्ठ वचन और दया भाव
रात के चारों प्रहर में चार हिरण (मृग, मृगी व शावक) वहां आए। शिकारी ने जैसे ही बाण साधा, हिरणों ने अपने परिवार से मिलने के बाद स्वयं लौटने का वचन दिया। प्रातःकाल पूरा मृग परिवार अपने सत्य की रक्षा हेतु शिकारी के सामने आ खड़ा हुआ। उनके सत्य और त्याग को देखकर शिकारी का हृदय पिघल गया और उसने धनुष-बाण फेंक दिया।
4चतुर्थ प्रसंग: महादेव का प्राकट्य और मोक्ष वरदान
चारों प्रहर अनजाने में किए गए रुद्राभिषेक और हृदय की दया से प्रसन्न होकर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। प्रभु ने शिकारी को सभी पापों से मुक्त कर 'गुह' नाम प्रदान किया और संपूर्ण मृग परिवार सहित उसे वैकुंठ/शिवलोक में स्थान दिया।
जो भी भक्त महाशिवरात्रि की पावन निशा में जागरण कर इस कथा का श्रवण करता है, उसके सात जन्मों के संचित पाप भस्म हो जाते हैं और वह अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।
