छठी मईया की पावन कथा: राजा प्रियंवद एवं देवसेना प्रसंग
ब्रह्मवैवर्त पुराण से षष्ठी देवी माहात्म्य
1प्रथम प्रसंग: राजा प्रियंवद का पुत्र शोक
प्राचीन काल में राजा प्रियंवद और उनकी पत्नी मालिनी को कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया, जिसके प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं किंतु नौ माह पश्चात मृत बालक का जन्म हुआ। राजा शोक में डूबकर श्मशान में अपने प्राण त्यागने को उद्यत हुए।
2द्वितीय प्रसंग: देवसेना (षष्ठी देवी) का दिव्य प्राकट्य
उसी समय आकाश से एक दिव्य विमान उतरा, जिसमें ब्रह्मा जी की मानस पुत्री 'देवसेना' विराजमान थीं। देवी ने कहा—'हे राजन! मैं प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न षष्ठी देवी हूं। जो भी प्राणी मेरी पूजा करता है, उसे संतान और समस्त सुख प्राप्त होते हैं।' देवी ने बालक का स्पर्श किया और वह खिलखिला कर जीवित हो उठा।
3तृतीय प्रसंग: द्रौपदी एवं माता सीता द्वारा छठ व्रत
द्वापर युग में जब पांडव जुए में राजपाट हारकर वनवास काट रहे थे, तब द्रौपदी ने महर्षि धौम्य के कहने पर कठिन छठ व्रत किया, जिससे पांडवों को उनका राज्य वापस मिला। त्रेतायुग में लंका विजय के पश्चात श्री राम और माता सीता ने भी सूर्यदेव का षष्ठी व्रत कर राजसूय यज्ञ किया था।
छठ पूजा की कथा सुनने से संतान हीन को संतान, निर्धन को धन और रोगी को उत्तम काया की प्राप्ति होती है।
