एकादशी देवी के प्राकट्य की पावन कथा
पद्म पुराण से एकादशी उत्पत्ति व मुर दैत्य संहार
1प्रथम प्रसंग: मुर दैत्य का आतंक और देवताओं का पलायन
सतयुग में 'मुर' नाम का अत्यंत बलशाली दैत्य हुआ जिसने देवराज इंद्र को परास्त कर अमरावती पर अधिकार कर लिया। देवगण व्याकुल होकर क्षीरसागर में भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। श्रीहरि ने मुर की सेना से सैकड़ों वर्षों तक युद्ध किया।
2द्वितीय प्रसंग: हेमवती गुफा में श्रीहरि का शयन और कन्या का प्राकट्य
युद्ध करते हुए भगवान बदरिकाश्रम की 'हेमवती' नामक 12 योजन लंबी गुफा में विश्राम करने चले गए और योगनिद्रा में लीन हो गए। मुर दैत्य सोते हुए श्रीहरि पर प्रहार करने पहुंचा। उसी क्षण भगवान के शरीर के तेज से एक दिव्य अस्त्र-शस्त्र सुसज्जित देवी प्रकट हुईं।
3तृतीय प्रसंग: एकादशी देवी द्वारा मुर दैत्य का वध
उस तेजस्विनी कन्या ने हुंकार भरते हुए मुर दैत्य को युद्ध के लिए ललकारा और पलक झपकते ही उसके रथ को भस्म कर उसका वध कर दिया। योगनिद्रा से जागने पर भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर पूछा कि आप कौन हैं? देवी ने कहा—'प्रभु! मैं आपके ही अंश से उत्पन्न हुई हूं।'
4चतुर्थ प्रसंग: एकादशी नामकरण और परम वरदान
भगवान नारायण ने कहा—'चूंकि तुम्हारा प्राकट्य मार्गशीर्ष मास की एकादशी को हुआ है, अतः तुम्हारा नाम 'एकादशी' होगा। जो भी मनुष्य प्रत्येक माह की दोनों एकादशियों पर अन्न का त्याग कर व्रत रखेगा, उसे अश्वमेध यज्ञ से भी कोटि गुना अधिक फल प्राप्त होगा और वह वैकुंठ लोक का अधिकारी बनेगा।'
एकादशी व्रत की कथा का पाठ करने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है और जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
