जीवित्पुत्रिका (जितिया) पावन व्रत कथा
राजा जीमूतवाहन का परोपकार एवं चील-सियारिन की कथा
1प्रथम प्रसंग: राजा जीमूतवाहन और शंखचूड़ नाग की रक्षा
गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन परम दयालु और परोपकारी थे। एक दिन भ्रमण करते हुए उनकी भेंट नागमाता से हुई, जिसका पुत्र शंखचूड़ पक्षीराज गरुड़ का आहार बनने वाला था। जीमूतवाहन ने शंखचूड़ की रक्षा हेतु स्वयं को वधशिला पर लाल कपड़े में लपेटकर प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ जब उनके शरीर को नोंचने लगे, तब जीमूतवाहन के चेहरे पर कोई भय नहीं था। उनके अद्भुत त्याग और दया से अभिभूत होकर गरुड़ जी ने उन्हें जीवनदान दिया और भविष्य में कभी किसी नाग को न खाने का वचन दिया।
2द्वितीय प्रसंग: चील और सियारिन की कथा
एक वन में चील और सियारिन ने साथ मिलकर जितिया का निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया। सियारिन भूख बर्दाश्त न कर सकी और उसने श्मशान जाकर शव खा लिया, जिससे उसका व्रत खंडित हो गया। चील ने निष्ठा से व्रत पूर्ण किया। अगले जन्म में चील के सातों पुत्र दीर्घायु और तेजस्वी हुए, जबकि सियारिन की संतानें बाल्यावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो गईं।
इस कथा को सुनने वाली माताओं की संतान पर कभी कोई संकट नहीं आता और वे दीर्घायु होते हैं।
